Wednesday, June 27, 2012

शिवोहम......

Shiva! The Infinite! Beyond the Creation and Dissolution. SHIVOHAM!
शिवोहम......

इस संसार में सारे शिवमय है सारे शिव है! शिव के ही अंग है, अंश है, मात्रा है...सभी एक ही सागर की बुँदे है.
शिव ­- कीसी भी परिभाषा से परे है. शिव को परिभाषित करने का प्रयास भी एक साहस ही होगा. एक नामुमकिन मिशन होगा...शिव को केवल अनुभव किया जा सकता है, बुद्धि से समझा नहीं जा सकता. वह बुद्धि से परे है, विचारों से परे है . एक विशाल सागर कहा एक छोटी कटोरी में समा सकता है भला!
मानव की समझ से शिव के कई पहलू है... अलग पहचान है जो समय-समय पर धुंधला जाती है. शिव एक सर्वोच्च परब्रम्ह है, एक परिमित अस्तित्व है. जिसने देवी पार्वती से शादी की है और जिनके दो बच्चे है.
शिव एक गृहस्वामी के रूप में मानव अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है. एक देव जो पत्नी और बच्चों के साथ है, फिर भी अतिश्रेष्ठ व आध्यात्मिकता में  अतिदृढ़ और शक्तिशाली है. एक ही समय में वह एक गृहस्थ है और एक गुरु भी है. गुरुओंके गुरु सर्वोच्च गुरु और सभी संतों के संत.. महानतम संत जो समय के साथ साथ भी है और कालातीत भी है....
दूसरी ओर, शिव परब्रह्म के रूप है -निराकार है, और समय और स्थान से परे है. शिव अविभाज्य एकात्मकता है. शिव की कोई शुरूआत या अंत नहीं है. वह परब्रह्म  है.
शिव लिंग - शिव का प्रतिनिधित्व करता है.  वह बहुआयामी, याने विविध पहलूवाला और पूर्ण-आयामी भी है. हम शिवके एक ऐसे अस्तित्व की पूजा करते है, जो नाराज होता है या गुस्सा भी करता है, (शीघ्र कोपी)  और भी आसानि से जिसको मनाया भी जा सकता है(शीघ्र प्रसादी).
शिव - जो परब्रह्म है वैसे ही जैसे भगवद गीता में भगवान कृष्ण ने सर्वोच्च का प्रतिनिधित्व किया है. ऐसे बुलंद चेतना की सभी पहचान एक निराकारसे है जो सभी आयामों, पहलुओंसे से परे है.

शिव का एक अन्य पहलू है दक्षिणामूर्ति, एक ज्ञान अवतार.
शिव एक चंडाल के रूप मैं आये जो भारतीय जाति व्यवस्था में निम्न जाति समझी जाती है. (वास्तव में यह जाति व्यवस्था गुनो की अलग - अलग संयोजना और जागरूकता के स्तरपर कि गयी है, यह एक व्यक्ति के उच्चता को निर्धारित करती है. शिव ने आदि शंकराचार्या को एक चंडाल के रूप में दर्शन देके यह साबित कर दिया, की किसी विशेष जाति में जन्म लेने से ही जागरूकता नहीं पाई जाती है. कृष्णा, येशु, बुद्ध, भगवान नित्यानंद और शिरडी बाबा कोई पंडित/पुरोहित जाति से नहीं थे.
 

Trinity…!

शिव चार कुत्तों के साथ (चार कुत्ते - चारों वेदों का प्रतिनिधित्व करते हैं) आदिशंकर को ज्ञान देने आये थे. (वेद धर्मं का रक्षण करते है, चार कुत्ते वेदों के संरक्षण के पहलू का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उदाहरण के लिए: कुत्तों के साथ भगवान दत्तात्रेय, धर्म के रक्षक बनके आये.  भगवान दत्तात्रेय- त्रिमूर्ति जो त्रिगुनो की एकता का प्रतिक है. वेदों के सिद्धांत कुत्तों के रूप में उनके साथ थे. कुत्ते वफादार, विश्वासु और हमेशा सतर्क भी होते है).
 
शिवजी  शिकारी के रूपमें भी आये थे.(वेत्ताक्कोरुमकन ), हनुमानजी भी शिव का ही अंश रूप माने जाते है... ऐसेही बहोत सारे रूप है... शिव ही ईश्वर है और ईश्वर ही सबकुछ है. ईश्वर के अलावा कुछ भी नहीं है.
इसका यह भी मतलब है, कि कोई भी किसी भी भगवान को स्वीकार कर सकते हैं, अगर वह उसकी जन्मजात के बनावट के आनुसार है तो.
प्रत्येक व्यक्ति की रचना अद्वितीय है. ब्रह्मा, विष्णु और महेश सर्वोच्च  परब्रह्म के तीन पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसका मतलब - निर्माण, रखरखाव, और विघटन. उन सबका महत्व समान है. वे सब एक ही हैं.
सभी अभिव्यक्तिया और विघटन सर्वोच्च अप्रकट से ही प्रकट हुयी है. बस सूक्ष्म रूप में कुछ विविधता है लेकिन मूलतः सब एक ही है...
                                                         Shiva..! The Yogi
सर्वोच्च अगठित अभिव्यक्ति ही ऊर्जा है. तो, त्रिमूर्ति में प्रत्येक मूर्ति एक समान और समान रूप से शक्तिशाली हैं. शिव के बारे में मेरा उल्लेख परब्रह्म है.  शिव सिर्फ विघटन की सीमित भूमिका के रूप में  नहीं है. इस संदर्भ में, शिव, विष्णु, ब्रह्मा एक ही हैं. त्रिमूर्ति नहीं है. केवल एक है. केवल एक परब्रह्म है. सभी अभिव्यक्तियों के पीछे बस एक ही ऊर्जा है. वह परब्रह्म है. असली स्रोत. सभी रूपों का जो प्रतिनिधित्व करते हैं, निराकार का भी. वह निराकार है. सभी भौतिक रूप उस निराकार से निर्माण होकर उसी में वापस भग्न/समाप्त हो जायेंगे. 
इस जीवन में जागरूकता के अलावा कुछ भी पोषक नहीं है. यहां तक ​​कि आध्यात्मिकता के लायक जागरूकता से अच्छा कोई पोषण नहीं है. आध्यात्मिकता एक स्थिति/अवस्था है, जो प्राकृतिक है और भी हमारे अस्तित्व का एक घटक है. यदि आध्यात्मिकता दोहराव और कर्मकांड बन जाती है तो यह अपने उद्देश्य खो देती है. आध्यात्मिकता आमतौर पर परिस्थितिनुरूप तेज या मंद बना देती है.   

Timeless Existence..!
आध्यात्मिकता सभी के जीवन में आती है अभी या बाद में.  क्योंकि यह आत्मा से संबंधित है, यह वही ऊर्जा है जो हमारे जीवन को चलाती है. तो हम इसका पोषण करे या ना करे यह तो हमारे साथ होती ही है.
आमतौर पर लोग आध्यात्मिकता की ओर तब झुकते है, जब लाचारी अपने चरम सीमापर होती है. जब कहीं और जाना नहीं है तो हम भगवान के तरफ बढ़ते है. यह मानव स्वभाव है. हमारी बाहरी दुनिया में पोषण के लायक कुछ भी नहीं है. हम जब दुनिया छोड़ के जायेंगे तो हमें सब कुछ यही छोड़ देना है अपना धन और अपने सम्बंधियोंको भी.
जागरूकता - ही हमारे भीतर पोषण के लायक पहलू है. जागरूकता जिसका हम पोषण करते है, जो जन्मों से हमारे साथ है.
 
Shiva – The Ultimate Awareness!
जागरूकता चेतना के साथ एक संयोग है. जो हम जब चाहे ईच्छा नुसार जोड़ सकते है. जैसे हम एक कक्षा से दुसरी कक्षा में प्रवेश करते है और एक साल से दुसरे साल में विकसित होते है और हमारे जीवन में समय के माध्यम से जागरूकता में वृद्धि होती है. जैसे ही जागरूकता बढती है, उच्च चेतना को पाना आसान हो जाता है. यह हमेशा साथ ही रहती है. लेकिन जब तक उच्च चेतना को कोई पा नहीं लेता तब तक हम उसका आनंद नहीं उठा सकते.
जागरूकता वह रास्ता है, जो हमें चेतना के उच्च स्थान तक पहुँचने में मदद करता है. अगर हमें माया का सागर पार करके अद्वैत चेतना की ऊँचाई तक पहुंचना है तो, हमें उच्चतम जागरूकता की जरुरत पड़ेगी इसीलिए इसकी पूंजी जोड़ना बहोत आवश्यक है और यह आतंरिक बात है, पूर्णता से आतंरिक कुछ भी बहार से नहीं है. आपके बाहरी दुनिया के गुरु भी तुम्हे सिर्फ यही मार्गदर्शन करेंगे की तूम्हारे आंतरिक गुरु को पहचानो,. माया का पर्दा हटाकर गुरु हमें जीवन मे ज्ञान का प्रकाश दिखाते है. लेकिन आपकी जागरूकता आपको ज्ञात करती है की आप असल मैं कौन है. जो हम मरने बाद भी हमारे साथ रहती है वह संपत्ति है जागरूकता. सिर्फ जागरूकता. इसीलिए ध्यान बहोत जरुरी है. सच्चाई का सत्य का अवलोकन करना बहोत महत्वपूर्ण है., सही गलत की पहचान बहोत जरुरी है, सदसद्विवेक बुद्धि होना बहोत जरुरी है.  जब शारीर छुट जाता है, मृत्यु तुमसे तुम्हारी जागरूकता  नहीं छीन सकती, जागरूकता तो आत्मा के साथ प्रवास करती है, दुसरे संस्कारो और अपूर्ण इच्छाओ की तरहा.  
मृत्यु हमसे बाकि सबकुछ छीन लेती है. तो सबसे अच्छा है की जागरूकता के लिए प्रयास करे. वैसे भी जागरूकता आंतरिक बात है और पैसा या धन बाहरी चीजे है, जो लौकिक जिंदगी के लिए अच्छा है. लेकिन मृत्यु के वोक्त आप वही साथ ले सकते हो जो अंदरूनी है जो आपके आत्मा के करीब है. शरीर, और, बाहरी चीजे तो पीछे छुट जाती है. हमें इस सत्य से हमेशा जागरूक रहना चाहिए.
सभी बाहरी चीजो से आत्मनिर्भरता ही उच्चतम जागरूकता का प्रतिक है. हम स्वाभविक रूपसे ही अपने आप को लोभ, स्वार्थ, क्रोध, असंतोष, और मोह से दूर रखते है.  दु:ख, इर्षा, दुसरोंसे स्पर्धा, तुलना, जड़त्व और असंतुलित वचन इससे भी दूर रखता है. और हम अपने आप ही निस्वार्थता, दया, क्षमा, निस्वार्थ प्रेम, आत्मनिर्भरता, और आनंद कुछ मिले ना मिले फिर भी आनंदी रहे यैसा आनंद!, यही चिन्ह है, उच्चतम जागरूकता का.
सबकुछ मेरे पास है किसी भी चीज की कमी नहीं है येही सोच हमारी सच्ची समृद्धि है. असली समृद्धि तो मन से होती है. इसीलिए बहार की  कोई भी चीज हमें आकर्षित नहीं करती है. लेकिन हाँ, चाहे जागरूकता बढ़ जाये लेकिन संस्कार तो  हमारे स्वाभाव में होते ही है जो हमेशा प्रकट होते है. लेकिन हमारी दूसरो पर निर्भर होने की प्रवृत्ति कम हो जाती है, हम विमुक्त जीवन जीना शुरू करते है. फिर ऐसे जीवन में ना तो पूजा अर्चना, मंत्र, जप-तप, या फिर और कुछ जो हमें आनंद देते थे, उसकी जरुरत नहीं महसूस होती.
हम लोग किसी भी चीज से बंधाते नहीं है, कोई आदत भी हमें बांध नहीं सकती. हम अन्दर से मुक्त रह्ते है. यैसा व्यक्ति इस रह पर चल सकता है, लेकिन उसे कुछ भी छू नहीं सकता. और ना ही वो कभी एन चिओंपर निर्भर होता है. उच्चतम जागरूकता के इस पहलू की कोई मन से प्रक्टिस करे तो उच्चतम जागरूकता उसके जीवन में बढ़ने लगाती है. या इसके उल्टा भी कर सकते है.
हम सब ज्ञान के अवतार है, सबकुछ हमारे अन्दर बसा है, याने ज्ञान आपसे अलग नहीं है. तुम ही ज्ञान के अवतार हो, ज्ञान हो.लेकिन तुम्हारी बुद्धि यह पह्चानने मे मत खाती है, और बाहरी दुनिया में अपने इन्द्रियों का उपयोग करके ज्ञान  ढून्डती फिरती है. जो की बहोत ही सिमित होते है, बहोत सीमाए है इन्द्रियोकी. यह तो वह बात हुयी की घर में खाने के लिए बहोत अच्छा भोजन होते हुए बहार रस्ते पर का खाना खाना. अन्दर का सुन्दर गहरा समुन्दर को उन्देखा करके, बाहार के छोटेसे तालाब की प्रशंशा करना.  हमारे अन्दर क्या है यह पचानाने के लिए बहोत गहरी जागरूकता चाहिए होती है, लेकिन हम तो आनंद हमेशा बाहार ही ढून्डते  है. तो बुद्धि के द्वारा देखोगे तो ज्ञान बाहर है, लेकिन असली सत्य तो यह है की ज्ञान हमारे अन्दर ही है, बाहरी दुनिया तो बस माया है. यह सारा जग माया की ही अभिव्यक्ति है. माया ही काम कर रही है.
द्वैत की अभिव्यक्ति - जहाँ सापेक्षता काम कर रही है. जब सब कुछ उबालकर शांत हो जाता है , जब साड़ी लहरे शांत हो जाती ह आइ, तो  बस स्थिर-अचल सागर रह जाता है. और सागर ही माया है  अगर तुम इसे बाहार से दोखो तो. अगर से जानो की तुम स्वयं ही सागर हो तो यह आत्मज्ञान बन जाता है - अहम् ब्रम्हास्मी: यहाँ कोई दूजा नहीं मेरे सिवा मै ही मै हूँ. कुछ भी जानने लायक भी नहीं है क्योकि सबकुछ मै ही हूँ. एक ही सब है  और सबमे ही एक है.
सबसे अच्छा धर्मं है, प्यार का धर्मं - मानवता का धर्मं. प्रेम जो सारे मानवी बन्धनों से मुक्त है - निस्वार्थ प्रेम.
जब भी आप कोई भी भूमिका निभाते है जैसे की माता -पिता, पाती-पत्नी, मालिक- नौकर, बेटा -बेटी, कर्मचारी-अफसर, या दोस्त, सामाजिक हो या व्यवसायीक हमने पूरीतरह से वस्तुगत होना चाहिए याने की निष्पक्ष होना चाहिए. हर भूमिका एकदम निष्पक्ष, किसीमे भी कोई गड़बड़  नहीं  होनी चाहिए, जो जिम्मेदारियों के बिच में कोई हलगर्जी नहीं होनी चाहिए, हर एक भूमिका १००% निभाना है.
काम को पवित्र समझाना चाहिए - एक पूजा की तरह. अगर हमें पता है की हम क्या कर रहे है और हमारा मन अगर कहि भटक नहीं रहा है पूरी तरह से काम मे लगा है तो हमारे पास बहोत समय बच जाता है.
विलम्ब करने से, हलगर्जीपण से हमारे जिंदगी का बहोत समय ख़राब होता है और हम लोग थक जाते है अधूरे बन जाते है. लोग सोचते बहोत है और करते काम है. और फिर तक्रार करते है की  कुछ से कुछ नहीं मिलता,जिंदगी बेकार है.  लोग अकेले चलने से डरते है. यह डर क्या है! डर हमें कमजोर बना देता है, डर के कारण लोग पंगु बनते है, डर हमें बांध लेता है, नाकर्ता बनता है. सत्य प्रिय कार्य में डर नहीं होता. जब तुम जो कर रहे हो उसपर प्रेम करोगे, विश्वास करोगे, तुम्हरा जीवन उद्देशपूर्ण बन जायेगा, तो ना तो थकान होगी ना तो उदासी होगी. विरक्ति, उदासी, यह पैदा होती है जब आप जो काम करते है उसमे आप खुश नहीं है तो.
तुम आनंद लो उसका जो तुम कर रहे हो, तो थकोगे भी नहीं और जिंदगी भी बड़ी शुद्ध, निर्मल, उद्देशभरी हो जाएगी...एक बार फिर से आवेश से भर जाओ.
शक्तिपात - यह एक उच्चतम उर्जा का स्त्रोत है जो उससे से कम उर्जावाले, अचल स्तर पर प्रवाहित होता है.
उच्चतम उर्जा सभी निष्क्रिय को भी सक्रीय कर देती है. यह सारी शरीर की पेशियोंको रोशन करती है ओर फिर से युवा बनती है.यह सारी रूकावटे निकल देती है और शक्तिपात लेनेवाले की आवृत्ति में बदलाव या उन्नति कराती है.
प्राणपथ और शिवपथ: दोनों का सिधांत एक ही है, त्रिव्रता/उत्कटता अलग है और परिणाम भी अलग है. एक पत्थर जैसे भगवन बन जाता है, एक पत्थर में अगर शाश्त्रोक्त विधि से प्राणप्रतिष्ठा कर दे या दैवी शक्ति को डाल दे तो वह भगवन बन जाता है. हम लोग भी जीवन के पत्थर है, या पत्थर जैसे है. (कभी कभी हम पत्थरो की तरह अनुत्तरदायी, असंवेदनशील जो बन जाते है)
वैसे ही शक्तिपात से हम पुनर्जीवित हो जाते है, फिर से युवा बन जाते प्राणशक्ति शक्तिपात लेनेवाले की उन्नति  कराती है. यह उन्हें उच्च आयमो  पर ले जाता है. यह उनका अंदरूनी सॉफ्टवेयर बदल देता है. जैसे की हर देवी-देवता की स्थापना करने की अलग अलग पद्धति है, और अलग- अलग मंत्र है  वैसे ही सबकी क्षमता व उर्जा का स्तर अलग अलग होता है. हर व्यक्ति उतना ही लेता है, जीतनी वोह सह सकता है. २० वाट के बल्ब मे अगर १००० वाट उर्जा डाल दे तो क्या होता है? अगर साधारण स्त्री की कोख में किसी अवतार की आत्मा आ जाये तो, वह कोख जादा दिन तक वह भार नहीं संभाल सकती, फट जाएगी. इसीलिए जब भी अवतार जन्म लेते है वह अपने लिए बहोत ही शक्तिशाली कोखवाली माँ का चुनाव करते है, ऐसी माँ का जो उन्हें जन्म दे सके, बहोत ही शक्तिशाली, मजबूत और सही माँ का चुनाव, जो एक अवतार को बड़ा कर सके. शक्तिपात देते वक्त व्यक्ति के स्वाभाविक आवृत्ति का कभी भी उल्लंघन नहीं किया जाता.
जागरूकता के स्तर के अनुसार सभीकी अपनी अपनी बाधाये  होती है. शक्तिपात हर व्यक्ति के चेतना के स्तर को बदल कर उसके उन कर्मों को जला देता है जो बाधाये बनकर रास्ता रोकती है. और सभी तरह की बाधाये दूर करता है जैसे की शारीरिक, भावनिक, बौद्धिक, अध्यात्मिक इत्यादि. जो खुले दिमागके और ग्रहणशील है, उनको शक्तिपात का अच्छा फायदा होता है, कुछ लोग बंद दिमाग लेकर  आते है, उनमे ग्रहंनशिलता नहीं होती, और बाद मे वह लोग तकरार करते है की कुछ भी अनुभव नहीं हुवा.  एक यह भी मनुष्य का स्वाभाव है.
बहोतसे हमारे महानतम गुरु और अवतार कहीसे भी यूही प्रकट हुए है. अपने तेज से और महानता से वह पहचाने गए. एक गुरु बहोत ज्ञानवान, बुद्धिवान होता है लेकिन उसका हर चेला वैसा बुद्धिशाली नहीं होता. अगर पूरी दत्त परम्परा देखी जाये तो बहोत सारे व्यक्तियोंको  पहचान मिली उनके महान व्यक्तित्वसे.  याने के महानता बहोत जरुरी है, अध्यात्मिक महानता, वंशपरम्परा से, जन्म से  महानता की पहचान नहीं होती, उससे सिर्फ स्थिति की पहचान  होती है. बहोत लोग स्थिति और महानता (स्टेटस एंड स्टेचर) में फर्क करने में गलती करते है. स्थिति याने के स्टेटस आपको नाम और शोहरत देता है. लेकिन महानता याने के स्टेचर कितने जन्मो की तपस्या से, अध्यात्मिक क्रियाओ से प्राप्त कि जाती है.
किसको पता है, या फिर किसको जानना है की आदि शंकराचार्यजी का, श्री व्यासजी का, श्री वसिष्ठजी का, श्री साईंबाबा का वंश क्या था?? उनकी महानता से ही उन्हें  पहचान मिली, आदर, मान-सम्मान मिला. व्यक्ति की महानता बड़ी  होती है उसके बाहरी परिस्थिति से उसके वंश से या उसके परम्परा से. परम्परा तो सिर्फ पंथ की जानकारी देती है या स्थिति से अवगत कराती है, लेकिन कभी भी अध्यात्मिक महानता के बारे मे नहीं बता सकती. अगर हमने अपने चेतना में बदलाव लाया तो वह हमें उसके अनुरूप स्पष्टता और शूद्धता की ओर ले जाती है. और यह केवल शूद्ध भावना से ही साध्य हो सकता है.
माया - यह भ्रम है, यहाँ हमेशा दृष्टि और जागरूकता में बदलाव होता रहता है, शारीरिक अभिव्यक्ति या उसका प्रकटीकरण यह सापेक्षता की अभिव्यक्ति है. वहां कुछ भी उच्च या कम नहीं होता. वैसे भी कम के बिना उच्च कैसे हो सकता है. द्वैत के बिना सापेक्षता किसे सिद्ध हो सकती है.
सापेक्षता हमें भ्रमित कराती है. सापेक्षता के पार जाईये तो  वहा पर भ्रम ख़तम होता है.
पलायनवाद यह किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता. जहाँ पर भी है आप अपने घर मे रहते हो, वैसे शांत और स्थिर रहो. आत्मा से जुड़े रहो, मन को कहि दूर भटकने ना दो. वातावरण कोई भी हो कुछ मायने नहीं रखता. गहरा विवेक और इच्छा मायने रखती है. अध्यात्म सिर्फ संतो के लिए नहीं ही, यह तो किसीकी भी जागीर बन सकता है क्योंकि यह तो जन्मजात सबके साथ में ही होता है.  हाँ विरक्ति या सन्यास यह मन की स्थिति है. उसके लिए तुम्हे भगवे वस्त्र या, हिमालय की जरुरत नहीं. मन से कोई भी कभीभी सन्यासी हो सकत है.
गुरु कोई व्यक्ति या शरीर नहीं होता, गुरु तो एक तत्त्व है, नक्षत्र है, चेतना है. वह तत्त्व तो हमेशा रहेंगा, शरीर जहाँ से आया था वहा जाने के बाद भी कालातीत अस्तित्व हमेशा रहेंगा. वह तत्त्व/चेतना एक ही है बस  शरीर बदलते रह्ते है.
सभी शिवमय है. सभी उसीकी, शिव की अभीव्यक्ति है, लेकिन अपने अपने कर्म किये जा रहे है किसी में भी कोई अंतर नहीं है. सभी लिंग भी एक ही है कोई भेद नहीं है. ना स्त्री है ना पुरुष सारे उस परब्रम्ह का रूप है. उस सर्वोच्च आत्मा का, परब्रम्ह का कोई लिंग होता है क्यादेवी देवता यह सब उस परब्रम्ह के प्रतिबिम्ब है. सब एक है.
द्वैत सापेक्षता की  प्रथम अभिव्यक्ति है इसीलिए दो दिखाते है. लेकिन एक ही है जो एकता का प्रतिक है. वहापर एक के आलावा कुछ भी नाही है.
सापेक्षता मे दो - मै और तुम इसका प्रतिनिधित्व करते है. लेकिन जब मै और तुम मिल जाते है तो एक बन जाते है, एकरुप हो जाते है- योग बन जाता है. शिव उर्जा का स्वरुप है ओर पार्वती भौतिकता का स्वरुप है. यह दोनों जब मिल जाते है तो ही अभिव्यक्ति पूरी होती है. लेकिन पुरुष या स्त्री यह उसीका विस्तार है. शिव भी अर्ध नारीश्वर है (आधा पुरुष और आधी स्त्री). 
भौतिक दुनिया में भी जब दो जिवोंकी शादी होती है तो आत्मा का प्रवास पूर्ण होता है याने की शारीरिक मिलनसे नही आत्मिक मिलनसे ही शादी का योग पूर्ण होता है. शादी का बंधन भी जीवन की यात्रा का, कर्मो की पूर्णता का प्रतिक है. कर्म-जीवन की पुर्ताता का प्रतिक.

Ardha Nari-Nateshwar..!
नारीत्व बहोतही ज्यादा पवित्र है, पूजनीय है, महान है. नारी/स्त्री एक माता है. ब्रम्हाजीने स्त्री को ही यह खास सौभग्य दिया है की वह उसका प्रतिबिम्ब बने. एक नये जिव का निर्माण करने का यह अधिकार ब्रम्हाजी के बाद स्त्री को ही है. स्त्री शक्ति का प्रतिक है, शारीरिक बल का नहीं, वह उर्जा शक्ति का, निर्माण शक्ति का, रचनात्मक शक्ति का, सहनशक्ति का प्रतिक है स्त्री!!
स्त्रीत्व यह तत्त्व है, शरीर से नहीं. नारीत्व तो मन से होता है. बाकि शरीर से और आत्मा से तो सब एक ही है. सारे देवी देवता भी एक ही है, सारे गुरु भी एक ही है. सारा ज्ञान भी एक ही है. तुम सारे भी एक ही हो, एकात्मकता का ही एक भाग हो. जब आप इस शरीर के द्वारा काम करते हो, जो तुमने कुछ समय के लिए किराये पर लिया हुवा है, तो तुम अपने पिता से अपने आप को अलग महसूस करते हो. जब तुम यह शरीर इस पृथ्वी पर छोड़ देते हो तो फिरसे वापस अपने पितासे मिलने, उनसे एक होने के लिए चले जाते हो.
हमने अलग अलग, विशेष गुणधर्मसे, विशेष कार्य के लिए देवी देवातोंको बनाया है और वह सारे वोही कार्य करते है. हमने कुछ खास पद्धति के लिए, पूजाओ के लिए, विविध कर्म-कांडो को पूरा करने के लिए देवी देवता बनाये, कुछ नक्षत्रोकी, ग्रहो की गणितीय गणना करने के लिए भी देवी-देवता बनाये गए और बदले भी गए. हर एक देवता के लिए हमारे मूलमंत्र अलग अलग है. मूलमंत्र ही देवताओंकी पहचान है, मूलमंत्र ही उनकी विशेषता को और उभारता है, निखारता है.
सारे एक है, एक से जुदा कुछ भी नहीं है. जब भी कुछ एक से जुदा होता है तो वह भ्रम होता है, या माया का ही एक भाग होता है. यह पूरा जग एक माया का खेल है. दैवी रंगमंच, मनोरंजन और विकल्पों का रंगमंच. स्थलीय जीवन विविध अनुभवों का जोड़ है. एक दिव्य कॉमेडी है या दिव्य भूल है, विकल्प है.....
जीवन एक बहोत बड़ा परिहास है फिर भी जादातर लोग इसको इतनी गंभीरता से लेते है, जीते की, उनकी जिंदगी गंभीर, दुखी खेल बन जाता है. लोग हसना भूल जाते है, भूल गए है, बड़े बड़े दुखी, सीरियस चहरे बनाके बैठते है, जबकि जिंदगी में सीरियस होने जैसा कुछ भी नहीं है. जिंदगी तो कॉमेडी है भुलोंकी, मोह-विमोह की कॉमेडी. यहाँ तो अपने पास है तो बस यह क्षण, हमें तो आगे क्या होने वाला है यह भी पता नहीं है, कल क्या होगा ये हमें मालूम नहीं तो चिंता किस बात की करनी है,जिंदगी हँसते हुए चाहिए.
परब्रम्ह भी एक योग है, दो शब्द 'पर' और 'ब्रम्ह' दो यह द्वैत का अस्तित्व दिखाते है. लेकिन दोनों एक ही है, एक ही हो जाते है. भ्रम हमें दो दिखता है माया हमें दो अलग अलग दिखाती है. लेकिन इन्हें मिलाना ही है, एक होकर ही यह एक अस्तित्व बनता है. और यह हमें बताता है की तुम परब्रम्ह हो, तुम उसका हिस्सा हो, अंश हो. परब्रम्ह यह पिता है और उन्हिसे द्वैत का निर्माण हुवा. आत्मा या ब्रम्ह एन सभी से परे होता है, सत्य और भ्रम से परे, सुख और दुख से परे. हम इस द्वैत माया का अंश है और हमें उसीमे मिल जाना है. संतोके, रुषियोंके माथे पर लगी हुयी रक्षा का यही मतलब है की हम राख़ से ही उत्पन्न हुए और उसीमे मिल जाना है, द्वैत तो एक भ्रम है.
हम सारे एक ही ब्रम्ह है, शिव है, यह सत्य जब कोई जान जाता है तो उसके स्वाभाव में विनम्रता आ जाती है, ब्रम्ह ज्ञान प्राप्त कर लेता है और वही संत बन जाता है.


Shiva is Himalayas. Shiva is all pervading. Shiva is everyone. Everyone is Shiva. Shiva is everything! Shivoham!
इसीलिए हमारा स्वाभाव शूद्ध और, दयावान हो. हमारे जिंदगी जीने का रवैय्या, कृतज्ञता से भरा हो. सभीकी जिंदगी आनंद से पूर्ण हो....

आनंद ही पूरी धरती पर हमारे जीवन की डोर बन जाये....सुनहरे जीवन का धागा बन जाये.......
सब शिवमय हो जाये. शिव और शक्ति के उर्जा का स्त्रोत बन जाये.
M

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